रांची : झारखंड की राजधानी रांची की रामनवमी आज सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा, संगठन और सांस्कृतिक एकता का एक जीवंत उदाहरण बन चुकी है. राजधानी की सड़कों पर जब महावीरी पताकाएं लहराती हैं और हजारों अखाड़ों की टोलियां अनुशासन और उत्साह के साथ आगे बढ़ती हैं, तो यह दृश्य सिर्फ वर्तमान का नहीं, बल्कि लगभग एक सदी पुराने इतिहास की गूंज भी साथ लेकर चलता है. इस परंपरा की जड़ें 1929 में पड़ती हैं, जब पहली बार रांची में रामनवमी की शोभायात्रा निकाली गई थी.
प्रेरणा हजारीबाग से, आयोजन रांची में
रांची में रामनवमी की शुरुआत एक प्रेरणा से हुई थी. वर्ष 1925 में हजारीबाग में गुरु सहाय ठाकुर द्वारा रामनवमी जुलूस की शुरुआत की गई थी. 1927 में रांची के श्रीकृष्ण लाल साहू अपने ससुराल हजारीबाग गए और वहां इस जुलूस को देखा. यह आयोजन उन्हें इतना प्रभावित कर गया कि रांची लौटकर उन्होंने अपने मित्रों जगन्नाथ साहू और अन्य साथियों को इसके बारे में बताया.
में रांची के लोग हजारीबाग जाकर रामनवमी देखा
इसके बाद 1928 में रांची के कुछ लोग खुद हजारीबाग जाकर इस आयोजन को देखने पहुंचे. यही वह क्षण था जिसने रांची में एक नई परंपरा की नींव रखी. अंततः 17 अप्रैल 1929 को रांची में पहली बार रामनवमी की शोभायात्रा निकाली गई.
पहली शोभायात्रा: सादगी में आस्था की झलक
1929 की पहली शोभायात्रा आज की भव्यता की तुलना में बेहद साधारण थी. इसमें केवल दो महावीरी झंडे थे और गिने-चुने लोग शामिल हुए थे. इस आयोजन को सफल बनाने में कृष्णलाल साहू, रामपदारथ वर्मा, राम बड़ाइक, नन्हकू राम, जगदीश नारायण शर्मा, लक्ष्मण राम मोची, जगन्नाथ साहू और गुलाब नारायण तिवारी जैसे लोगों की प्रमुख भूमिका रही. हालांकि स्वरूप छोटा था, लेकिन आस्था और उत्साह में कोई कमी नहीं थी. यही वह बीज था, जिसने आने वाले वर्षों में एक विशाल परंपरा का रूप ले लिया.
अखाड़ा परंपरा और संगठन की नींव
1930 में शोभायात्रा का विस्तार हुआ और महावीरी झंडों की संख्या बढ़ने लगी. इस वर्ष रातू रोड स्थित ग्वाला टोली से नन्हू भगत के नेतृत्व में शोभायात्रा निकाली गई. धीरे-धीरे इसमें अखाड़ों की भागीदारी बढ़ने लगी.
5 अप्रैल 1935 की पहली बैठक में महावीर मंडल का गठन
इस बढ़ती भागीदारी और आयोजन को व्यवस्थित स्वरूप देने के लिए 5 अप्रैल 1935 को अपर बाजार स्थित संतुलाल पुस्तकालय में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई. इसी बैठक में महावीर मंडल का गठन किया गया. महंत ज्ञान प्रकाश उर्फ नागा बाबा इसके प्रथम अध्यक्ष और डॉ. रामकृष्ण लाल महामंत्री बनाए गए. यहीं से रामनवमी शोभायात्रा को एक संगठित ढांचा मिला, जो आज तक कायम है.
महावीर चौक से तपोवन तक: परंपरा का मुख्य मार्ग
समय के साथ रांची की रामनवमी शोभायात्रा का एक तय मार्ग और स्वरूप विकसित हुआ, जिसमें महावीर चौक (अपर बाजार) से तपोवन मंदिर तक पताका पहुंचाने की परंपरा सबसे केंद्रीय बन गई. आज भी यह परंपरा उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है. पंडरा से शोभायात्रा की शुरुआत होती है, लेकिन इसका धार्मिक और प्रतीकात्मक केंद्र महावीर चौक स्थित महावीर मंदिर ही है. यहां सभी प्रमुख अखाड़े अपनी-अपनी पताकाओं के साथ पहुंचते हैं. यहीं पर पूजा-अर्चना होती है और 1929 के पहले महावीरी झंडे का भी विधिवत पूजन किया जाता है.
महावीर चौक से जैसे ही शोभायात्रा आगे बढ़ती है, पूरा शहर एक चलती-फिरती आस्था में बदल जाता है. ड्रम, नगाड़े, पारंपरिक युद्धकला के प्रदर्शन, और भगवा पताकाओं की कतारें यह सब मिलकर एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करते हैं.
शुरुआती सीमाएं और विस्तार का सफर
प्रारंभिक वर्षों में यह शोभायात्रा मुख्य रूप से रातू रोड और आसपास के इलाकों तक सीमित थी. लेकिन जैसे-जैसे लोगों की भागीदारी बढ़ी, इसमें नए-नए अखाड़े जुड़ते गए. धीरे-धीरे अपर बाजार, भुतहा तालाब, मोरहाबादी, कांके रोड, बरियातू, चडरी, लालपुर, चर्च रोड, मल्लाह टोली, चुटिया और हिंदपीढ़ी जैसे क्षेत्रों के अखाड़े इसमें शामिल होने लगे. यह विस्तार केवल भौगोलिक नहीं था, बल्कि सामाजिक समावेश का भी प्रतीक था, जहां विभिन्न समुदायों और वर्गों के लोग एक साथ इस आयोजन का हिस्सा बने.
रतन टॉकीज तक पहुंचते-पहुंचते शोभायात्रा का स्वरूप विशाल हो जाता था. यहां से आगे बढ़ते हुए सभी अखाड़ों की पताकाएं अंततः निवारणपुर स्थित तपोवन मंदिर पहुंचती हैं.
तपोवन मंदिर: आस्था का अंतिम पड़ाव
महावीर चौक से शुरू होकर तपोवन मंदिर तक पताका पहुंचाना इस शोभायात्रा का चरम बिंदु होता है. तपोवन मंदिर के सामने स्थित मैदान में सभी अखाड़े अपनी-अपनी पताकाएं खड़ी करते हैं. यह दृश्य अत्यंत भव्य और भावनात्मक होता है जहां सैकड़ों-हजारों झंडे एक साथ लहराते हैं. यहां झंडाधारी भगवान राम, सीता और हनुमान जी की पूजा-अर्चना करते हैं. इसके बाद शोभायात्रा का समापन होता है और लोग वापस लौटते हैं.
समय के साथ बदलाव: परंपरा से आधुनिकता तक
रांची की रामनवमी ने समय के साथ कई बदलाव देखे हैं. शुरुआती दौर में जहां यह एक छोटा धार्मिक आयोजन था, वहीं आज यह एक विशाल सांस्कृतिक आयोजन बन चुका है. जहां 1929 में केवल दो झंडे थे, वहीं आज करीब 1800 से अधिक अखाड़े इसमें भाग लेते हैं. अब प्रशासनिक स्तर पर व्यापक सुरक्षा व्यवस्था, ट्रैफिक प्रबंधन और निगरानी की जाती है.
[1:48 pm, 23/3/2026] Sandeep Jain: पारंपरिक लाठी-भाला और युद्धकला के साथ-साथ अब झांकियां, बैंड और आधुनिक साउंड सिस्टम भी शामिल हो गए हैं. पहले सीमित समुदाय तक सीमित आयोजन अब शहर के हर वर्ग की भागीदारी का प्रतीक बन गया है. हालांकि इन बदलावों के बावजूद, शोभायात्रा का मूल भाव भगवान राम के प्रति श्रद्धा और महावीरी पताका की परंपरा आज भी वैसा ही बना हुआ है.
आज की रामनवमी: भव्यता और विरासत का संगम
आज की राजधानी रांची में निकलने वाली रामनवमी शोभायात्रा अपने ऐतिहासिक स्वरूप से कहीं अधिक भव्य हो चुकी है, लेकिन इसकी आत्मा अब भी वही है. महावीर चौक से तपोवन तक पताका ले जाने की परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और अनुशासन के साथ निभाई जाती है, जैसा दशकों पहले होता था. यह आयोजन अब केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और शहर की विरासत का प्रतीक बन गया है.
तपोवन मंदिर: इतिहास, आस्था और भविष्य
इस पूरी परंपरा का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है – निवारणपुर स्थित लगभग 400 वर्ष पुराना तपोवन मंदिर. लगभग 300 से 400 वर्ष पुराना यह मंदिर रांची की धार्मिक पहचान का एक प्रमुख केंद्र है. मान्यता है कि प्राचीन समय में यहां ऋषि-मुनि तपस्या करते थे, इसलिए इसका नाम ‘तपोवन’ पड़ा.
[ मंदिर में राम, सीता और हनुमान जी की प्राचीन प्रतिमाएं स्थापित हैं और यह स्थान मन्नतों के लिए भी प्रसिद्ध है. रामनवमी के दौरान यहां पहुंचना हर अखाड़े के लिए अनिवार्य और गौरवपूर्ण माना जाता है.
64 फीट ऊंचे तपोवन मंदिर का नवनिर्माण
वर्तमान में इस मंदिर को अयोध्या की तर्ज पर एक भव्य रूप देने की योजना पर काम चल रहा है. 64 फीट ऊंचे शिखरों वाले इस नए मंदिर परिसर में आधुनिक सुविधाएं भी विकसित की जा रही हैं, जिससे यह आस्था और पर्यटन दोनों का प्रमुख कें
रांची की रामनवमी शोभायात्रा का इतिहास एक छोटे से जुलूस से शुरू होकर एक विशाल जनआंदोलन में बदलने की कहानी है. महावीर चौक से तपोवन मंदिर तक पताका पहुंचाने की परंपरा इस पूरे आयोजन की आत्मा है, जो अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक सूत्र में बांधती है. यह सिर्फ एक जुलूस नहीं, बल्कि रांची की पहचान है जहां हर साल इतिहास फिर से सड़कों पर उतरता है और आस्था के साथ आगे बढ़ता है.

