रांची: सरहुल, दो शब्दों से बना है, सर और हूल. सर मतलब सरई या सखुआ (साल के वृक्ष) फूल और हूल का मतलब क्रांति से है. इस तरह सखुआ फूलों की क्रांति को सरहुल कहा गया. मुंडारी, संथाली और हो-भाषा में सरहुल को बा या बाहा पोरोब, खड़िया में जांकोर, कुड़ुख में खद्दी या खेखेल बेंजा, नागपुरी, पंचपरगनिया, खोरठा और कुरमाली भाषा में इस पर्व को सरहुल कहा जाता है.
झारखंड की पहचान उसकी समृद्ध आदिवासी संस्कृति और परंपराओं से होती है. इन्हीं परंपराओं में से एक प्रमुख पर्व है सरहुल, जिसे प्रकृति पूजा का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है. वर्ष 2026 में यह पर्व 21 मार्च को मनाया जाएगा. जिसकी तैयारी आदिवासी समुदाय के द्वारा शुरू कर दी गयी है.
झारखंड के साथ-साथ छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों के आलवे नेपाल, भूटान, मान्यमार में भी सरहुल पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. झारखंड की राजधानी रांची में भी इसे लेकर अभी से तैयारियां शुरू हो गई हैं.
अच्छी फसल और सुख-शांति की कामना
सरहुल मूल रूप से वसंत ऋतु का त्योहार है, जिसे आदिवासी समुदाय नए साल की शुरुआत के रूप में भी मानता है. यह पर्व चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन से शुरू होकर चैत्र पूर्णिमा तक तीन दिनों तक मनाया जाता है. इस दौरान गांव के पुजारी, जिन्हें पहान कहा जाता है, सरना स्थल पर पूजा-अर्चना करते हैं. पहान गांव की समृद्धि, अच्छी फसल और सुख-शांति की कामना करते हुए सूर्य, ग्राम देवता और पूर्वजों को फूल, फल, सिंदूर, मुर्गा और तपन (चावल से बनी पारंपरिक मदिरा-हड़िया) अर्पित करते हैं.
सखुआ के फूलों का विशेष महत्व
आदिवासी समाज मूल रूप से प्रकृति पूजक है. वे धरती, आकाश, सूर्य, चंद्रमा, पेड़-पौधों और नदियों को देवता के रूप में मानते हैं. चैत्र और वैशाख के महीनों में प्रकृति नए रूप में दिखाई देती है. पेड़ों से पुराने पत्ते गिर जाते हैं और उनम…
धरती और सूर्य का प्रतीकात्मक विवाह
जनजातीय परंपराओं के जानकार प्रोफेसर डॉ. वीरेंद्र कुमार महतो बताते हैं कि सरहुल पर्व में धरती और सूर्य की प्रतीकात्मक शादी कराई जाती है. मान्यता है कि धरती माता और सूर्य देव के मिलन से ही जीवन और खेती का चक्र चलता है. उरांव जनजाति के लोग इस दिन को नए साल की शुरुआत के रूप में भी मनाते हैं. पूजा के बाद गांव के लोग साल के फूल लेकर पारंपरिक नृत्य करते हैं और गीत गाते हैं.
केकड़े को लेकर किवदंती!
आदिवासी समाज में केकड़े से जुड़ी कुछ किवदंती है. ऐसा माना जाता है कि केकड़ा ने पूर्वजों को शरण देने में मदद की थी. इसलिए सरहुल के दिन पूर्वजों के साथ-साथ केकड़ा की भी पूजा की जाती है. केकड़ा को अरवा धागा में बांधकर घर में रखा जाता है. केकड़ा को घर में ऐसे सुरक्षित जगह पर रखा जाता है जहां अच्छी तरह से सूख जाए. सरहुल संपन्न होने के बाद बारिश के समय उसी सूखे केकड़े का चूर्ण बनाया जाता है. इस चूर्ण को धान और गोबर में मिलाकर बुआई शुरु की जाती है. माना जाता है कि केकड़ा एक साथ बड़ी संख्या में अंडे देता है तो धान की बाली भी अनगिनत की संख्या में फूटे, ऐसी कामना की जाती है.
मछली और केकड़ा पकड़ने की परंपरा है खास
सरहुल पर्व से जुड़ी कई अनोखी परंपराएं भी हैं. इनमें मछली और केकड़ा पकड़ने की परंपरा खास मानी जाती है. आदिवासी मान्यता के अनुसार मछली और केकड़े को पृथ्वी का पूर्वज माना जाता है. एक लोककथा के अनुसार इन्हीं जीवों ने समुद्र की गहराई से मिट्टी निकालकर धरती के निर्माण में मदद की थी. इसी कारण सरहुल के पहले दिन युवा तालाब या नदी में जाकर मछली और केकड़ा पकड़ते हैं. पकड़े गए केकड़ों को बाद में खेतों में डाल दिया जाता है, जिससे फसल अच्छी होने की मान्यता है.
दो घड़ों में पानी लाकर सरना स्थल पर रखने की रस्म है जल रखाई
सरहुल के दौरान जल रखाई पूजा भी होती है. इस पूजा में पहान के साथ गांव वाले नदी या तालाब से दो नए घड़ों में पानी लाकर सरना स्थल पर रखते हैं. पूजा के दौरान अलग-अलग देवताओं के नाम पर मुर्गों की बलि दी जाती है. सफेद मुर्गा सृष्टिकर्ता के नाम पर, लाल मुर्गा ग्राम देवता के लिए, जबकि काली मुर्गी बुरी आत्माओं को शांत करने के लिए अर्पित की जाती है.
बारिश की भविष्यवाणी
इस पर्व से जुड़ी एक और रोचक परंपरा बारिश की भविष्यवाणी की है. जल रखाई के दूसरे दिन सुबह पूजा के बाद पहान मिट्टी के बर्तनों में भरे पानी को देखकर अनुमान लगाते हैं कि आने वाले मौसम में बारिश कैसी होगी. अगर पानी कम हो जाता है तो इसे कम बारिश का संकेत माना जाता है, जबकि पानी समान रहने पर अच्छी वर्षा की संभावना जताई जाती है. कृषि आधारित जीवन में इस परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है.
फूलखोसी के साथ सरहुल का समापन
फूलखोसी के मौके पर पहान अपने घर में साल यानी सरई फूल अर्पित करते हैं. इस दौरान अन्न भंडार, संदूक समेत घर के सभी दरवाजों पर पुष्प अर्पित किया जाता है. घर में पूजा के बाद पुरोहित ग्राम भ्रमण पर निकलते हैं. वे हर घर में जाकर सरई फूल देते हैं. इस दौरान घर के लोग पाहन का पैर धोकर सम्मान करते हैं. उनके माथे पर सरसो तेल लगाया जाता है. इसके बाद ही सरहुल की विशाल शोभायात्रा निकाली जाती है.
सरहुल के अवसर पर भव्य शोभायात्रा
पिछले कुछ दशकों में सरहुल के अवसर पर भव्य शोभायात्रा निकालने की परंपरा भी मजबूत हुई है. रांची में इसकी शुरुआत वर्ष 1967 में कार्तिक उरांव के नेतृत्व में हुई थी. इस शोभायात्रा में आदिवासी समुदाय पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य-गीत प्रस्तुत करते हुए अपनी संस्कृति और परंपरा का प्रदर्शन करते हैं.
प्रकृति के प्रति आदिवासी समाज के प्रेम और सम्मान का प्रतीक
स्थानीय छात्राओं ने कहा कि सरहुल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आदिवासी समाज के प्रेम और सम्मान का प्रतीक है. इस दिन धरती माता की पूजा कर उनसे सभी जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के सुख-समृद्ध रहने की कामना की जाती है.
संस्कृति और सामुदायिक एकता का पर्व
सरहुल केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और सामुदायिक एकता का पर्व है. यह आदिवासी समाज को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़े रखता है. झारखंड में इस पर्व को लेकर हर साल जो उत्साह देखने को मिलता है. वह इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक दौर में भी प्रकृति के प्रति आस्था और सांस्कृतिक पहचान आज भी उतनी ही मजबूत है और इसे लेकर राजधानी रांची में युद्ध स्तर पर तैयारी की जा रही है.
झारखंड के 5 समुदायों का सरहुल
मुंडा समाज द्वारा बहा पोरोब मनाया जाता है. सखुआ, साल या सरजोम वृक्ष के नीचे मुंडारी खूंटकटी भूमि पर सभी धार्मिक विधि-विधान इसी सरना स्थल पर पुरोहित द्वारा संपन्न किया जाता है. जब सखुआ की डालियों पर सखुआ फूल भर जाते हैं तब गांव के लोग एक
निर्धारित तिथि पर बहा पोरोब मनाया जाता है. बहा पोरोब के पूर्व से पहान (पहंड़)…
हो समुदाय बा पोरोब मनाता है. बा का शाब्दिक अर्थ है फूल अर्थात फूलों का ये त्योहार बा पर्व तीन दिन तक मनाया जाता है. सर्वप्रथम बा:गुरि, दूसरे दिन मरंग पोरोब और अंत में बा बसि मनाया जाता है. बा गुरि के दिन नए घड़े में तैयार भोजन मुखिया द्वारा मृत आत्माओं, पूर्वजों एवं ग्राम देवता को अर्पित किया जाता है और देवता सिंगबोंगा (ईश्वर) से सुख-शांत की कामना करते हैं. दूसरे दिन जंगल जाकर साल की डालियां फूल सहित काटकर लाते हैं और पूजा के बाद आंगन-चौखट में प्रतीक स्वरूप लगाते हैं. तीसरे दिन बा बसि में सभी पूजन सामग्रियों को विसर्जित किया जाता है और रात में नाच-गान होता है.
उरांव समाज का खेखेल बेंजा, सरहुल के दिन सृष्टि के दो महान स्वरूप शक्तिमान सूर्य एवं कन्या रूपी धरती का विवाह होता है. जिसकी कुड़ुख या उरांव में खेखेल बेंजा कहते हैं. इसका प्रतिनिधित्व उरांव पुरोहित (नयगस) और उनकी धर्मपत्नी (नगयिनी) करती हैं. इनका स्वांग रचा जाता है. उरांव संस्कृति में सरहुल पूजा के पहले तक धरती कुंवारी कन्या की भांति देखी जाती है. उरांव पहान घड़े का पानी देखकर बारिश की भविष्यवाणी करते हैं. पहान द्वारा सरना स्थल पर पूजा के दौरान तीन मुर्गों की बलि दी जाती है और खिचड़ी बनाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है. फिर पहान प्रत्येक घर के बुजुर्ग या गृहिणी को चावल एवं सरना फूल देते हैं ताकि किसी प्रकार का संकट घर में ना आए. सरहुल के एक दिन पहले केकड़ा खोदने का रिवाज है. केकड़ा को पूर्वजों के रूप में बाहर लाकर सूर्य और धरती के विवाह का साक्षी बनाया जाता है. सरहुल के बाद ही खरीफ फसल की बोआई के लिए खाद और बीज डाला जाता है.
संथाल में बाहा मनाया जाता है. प्राचीन काल से साल और महुआ को देव स्वरूप मानकर पूजने की प्रथा चली आ रही है. बाहा फागुन का चांद निकलने के पांचवें दिन शुरू होता है और पूरे महीने चलता है. जाहेरथान (पूजन स्थल) में ईष्ट देव की पूजा पारंपरिक विधि के साथ की जाती है. मुर्गा बलि के बाद खिचड़ी का प्रसाद लोग ग्रहण करते हैं. दूसरे दिन लोग जाहेरथान में नायकी सखुआ फूल एवं पारंपरिक सामग्री संग पूजा करते हैं. तीसरे दिन फागु या बाहा सेंदरा मनाया जाता है. घर के पुरुष सेंदरा से लौटते हैं तो धनुष और सारे अस्त्र-शस्त्र को खोला जाता है. इसमें बाहा नृत्य होता है, जिसमें महिलाएं अकेली नृत्य करती हैं, पुरुष वाद्ययंत्र बजाते हैं. विशेष राग में गीत और नृत्य किया जाता है.
खड़िया समुदाय जांकोर पर्व मनाता है. जांग+एकोर अर्थात फलों-बीजों का क्रमवार विकास. यह पर्व फागुन पूर्णिमा के एक दिन पहले शुरू हो जाता है. पुरुष दिन में शिकार करने चले जाते हैं और शाम को दो नए घड़ों में पानी लाकर रखा जाता है. दूसरे दिन पहान पूजा के बाद बलि देते हैं. दोनों घड़े का पानी देखकर पहान पूर्ण वर्षा होने या ना होने की भविष्यवाणी करते हैं. पहान लोगों को सखुआ फूल देकर आशीर्वाद देते हैं. इसी दिन शाम में पहान सेमल वृक्ष में धाजा-फागुन काटते हैं. फिर इस डाली को लोग अपने घरों में लगा देते हैं. तीसरे दिन फूलखोसी की रस्म प्रत्येक गांव में निभाई जाती है.

