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Home»Today's Top News»हरनौत की हार से बिहार की सत्ता तक : नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा अब राज्यसभा की ओर
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हरनौत की हार से बिहार की सत्ता तक : नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा अब राज्यसभा की ओर

जस्ट पोस्टBy जस्ट पोस्टMarch 5, 2026No Comments7 Mins Read39 Views
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पटना: बिहार की राजनीति में गुरुवार को बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया। जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री Nitish Kumar ने घोषणा की है कि वह इस बार राज्यसभा का चुनाव लड़ेंगे। इसके साथ ही करीब दो दशकों से अधिक समय से मुख्यमंत्री पद पर उनका कार्यकाल समाप्त हो जाएगा। उन्होंने साफ किया कि राज्य में बनने वाली नई सरकार को उनका पूरा सहयोग और मार्गदर्शन मिलेगा। माना जा रहा है कि उनके पद छोड़ने के बाद सरकार में सहयोगी दल Bharatiya Janata Party का कोई नेता मुख्यमंत्री बन सकता है।

ट्वीट कर जताया लोगों का आभार
नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया पर लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि पिछले दो दशकों से जनता ने उन पर भरोसा जताया है और उसी भरोसे के दम पर उन्होंने बिहार की सेवा की है। उन्होंने लिखा कि लोगों के समर्थन की वजह से ही बिहार आज विकास और गरिमा की नई पहचान बना पाया है। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए उन्होंने राज्यसभा का सदस्य बनने की इच्छा जताई है। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद भी जनता से उनका रिश्ता बना रहेगा और विकसित बिहार के लिए वह लगातार काम करते रहेंगे।


नई सरकार को देंगे मार्गदर्शन
नीतीश कुमार ने अपने संदेश में कहा कि राज्य में जो नई सरकार बनेगी, उसे उनका पूरा सहयोग मिलेगा। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार के विकास की दिशा में जो काम शुरू हुए हैं, उन्हें आगे बढ़ाने में वह हर संभव मदद करेंगे।

हरनौत में मिली थी करारी हार
बिहार की राजनीति में शायद ही कोई ऐसा नेता रहा हो जिसकी कहानी उतार-चढ़ाव, हार-जीत और बार-बार वापसी की मिसाल बन गई हो। हरनौत विधानसभा से मिली शुरुआती दो हारों ने एक समय ऐसा माहौल बना दिया था कि लगता था नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा यहीं थम जाएगी। लेकिन उन्होंने हार को ही अपनी ताकत बना लिया। गांव की पगडंडी से निकलकर इंजीनियरिंग पढ़ने वाला यह युवक धीरे-धीरे बिहार की सत्ता के सबसे मजबूत चेहरों में बदल गया। अब जब उन्होंने राज्यसभा जाने का फैसला कर लिया है तो यह एक ऐसे राजनीतिक अध्याय का मोड़ है जिसने लगभग दो दशकों तक बिहार की सत्ता को प्रभावित किया।

लालू के दौर में तैयार हो रही थी नई जमीन
1990 के दशक में बिहार की राजनीति पर लालू प्रसाद यादव का दबदबा था। 1990 से शुरू हुआ उनका दौर करीब सात साल तक मुख्यमंत्री के रूप में चला। यह वह समय था जब पहली बार किसी पिछड़ी जाति के नेता ने इतनी लंबी अवधि तक राज्य की सत्ता संभाली। बाद में चारा घोटाले के आरोप सामने आए और लालू को पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद उनकी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं और परिवार की राजनीतिक पकड़ बरकरार रही। इसी दौर में नीतीश कुमार धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बना रहे थे। कभी लालू के करीबी माने जाने वाले नीतीश ने यादव जाति के प्रभाव वाली राजनीति के समानांतर कुर्मी और अत्यंत पिछड़ी जातियों के बीच अपना आधार तैयार करना शुरू किया।

समाजवादी राजनीति से निकला नेतृत्व
नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव दोनों ही समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर के शिष्य माने जाते हैं। कर्पूरी ठाकुर ने 1970 के दशक में ओबीसी आरक्षण लागू कर पिछड़ी राजनीति को मजबूत किया था। 1951 में नालंदा जिले के कल्याण बिगहा में जन्मे नीतीश कुमार का परिवार राजनीतिक विचारों से प्रभावित था। उनके पिता स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे और घर में डॉ. राम मनोहर लोहिया की समाजवादी विचारधारा की चर्चा होती थी। नीतीश ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, लेकिन नौकरी करने के बजाय राजनीति का रास्ता चुना। शुरुआत आसान नहीं थी। हरनौत से उन्होंने दो चुनाव लड़े और दोनों में हार का सामना करना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने राजनीति छोड़ने का मन बना लिया था।

पहली जीत से खुला आगे का रास्ता
1985 में लोकदल के टिकट पर नीतीश कुमार ने हरनौत से चुनाव जीता। यही जीत उनके लिए बड़ा मोड़ साबित हुई। इसके बाद 1989 में वह बाढ़ लोकसभा सीट से सांसद बने और वी.पी. सिंह सरकार में कृषि राज्य मंत्री बने। 1991 में उन्होंने फिर से बाढ़ सीट जीत ली। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीति में उनकी पहचान बनने लगी।

समता पार्टी से जदयू तक
1994 में नीतीश कुमार ने जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई। बाद में यही पार्टी आगे चलकर जनता दल यूनाइटेड बनी। 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने दो सीटों से चुनाव लड़ा। बाढ़ से हार गए लेकिन नालंदा से जीतकर संसद पहुंचे। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में उन्होंने रेलवे, कृषि और सतही परिवहन जैसे मंत्रालय संभाले।

पहली बार मुख्यमंत्री बने लेकिन सिर्फ एक सप्ताह
मार्च 2000 में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। लेकिन उस समय उनके पास विधानसभा में बहुमत नहीं था। सिर्फ एक सप्ताह के भीतर ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और राबड़ी देवी की सरकार फिर लौट आई। हालांकि यह असफलता ज्यादा दिनों तक नहीं रही।

2005 में बदल गया बिहार का राजनीतिक समीकरण
2005 का साल बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव लेकर आया। फरवरी में हुए चुनावों में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया। अक्टूबर में फिर चुनाव हुए। इस बार जदयू और भाजपा गठबंधन को बड़ी सफलता मिली। जदयू को 88 और भाजपा को 55 सीटें मिलीं जबकि राजद 54 पर सिमट गया। यहीं से नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद संभाला और बिहार की राजनीति में एक लंबे दौर की शुरुआत हुई।

सुशासन की छवि और विकास की राजनीति
मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने प्रशासनिक सुधार और विकास को प्राथमिकता दी। सड़कों का निर्माण, स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए साइकिल योजना और कानून व्यवस्था में सुधार जैसे कदमों ने उनकी छवि मजबूत की। इसी दौर में उन्हें सुशासन बाबू कहा जाने लगा। 2010 के विधानसभा चुनाव में जदयू और भाजपा गठबंधन ने बड़ी जीत दर्ज की। जदयू को 115 और भाजपा को 81 सीटें मिलीं जबकि राजद 22 सीटों पर सिमट गया।

गठबंधन बदलने की राजनीति
2013 में जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख चेहरा बनाया तो नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू को केवल दो सीटें मिलीं। हार की जिम्मेदारी लेते हुए नीतीश ने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। बाद में उन्होंने लालू प्रसाद यादव के साथ महागठबंधन बनाया और 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराया। उस चुनाव में राजद को 80 और जदयू को 71 सीटें मिलीं। हालांकि कुछ समय बाद उन्होंने फिर भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया और सत्ता में वापसी कर ली।

ओबीसी और ईबीसी समीकरण की राजनीति
नीतीश कुमार की राजनीतिक ताकत का बड़ा आधार ओबीसी और अत्यंत पिछड़ी जातियों का संतुलन रहा है। कुर्मी समुदाय से आने वाले नीतीश ने इस सामाजिक समीकरण को मजबूत किया। उन्होंने भाजपा के उच्च जातियों के समर्थन और अपने सामाजिक आधार को मिलाकर बिहार की राजनीति में नया संतुलन बनाया। इसी रणनीति ने उन्हें लंबे समय तक सत्ता में बनाए रखा।

अब राज्यसभा की ओर नई पारी
करीब दो दशकों तक बिहार की राजनीति का केंद्र रहे नीतीश कुमार अब राज्यसभा जाने का फैसला कर चुके हैं। उनके इस निर्णय के साथ राज्य की राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। हरनौत की हार से शुरू हुई यह कहानी बिहार के मुख्यमंत्री पद तक पहुंची और अब संसद के उच्च सदन की ओर बढ़ रही है। नीतीश कुमार की राजनीति की खासियत यही रही कि वह कई बार संकट में फंसे, गठबंधन बदले, आलोचनाएं झेलीं, लेकिन हर बार किसी न किसी तरह वापसी करने में सफल रहे। यही वजह है कि बिहार की राजनीति में उनका नाम लंबे समय तक एक मजबूत और टिकाऊ नेता के रूप में याद किया जाएगा।

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