
मेन रोड स्थित बिरसा विहार में राज्य के खनन पट्टाधारियों एवं क्रसर व्यवसायियों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता झारखंड राज्य पत्थर उद्योग संघ के अध्यक्ष श्री बंदेश्वर प्रसाद सिंह (साहिबगंज) ने की।
बैठक में मुख्य रूप से माननीय उच्ब न्यायालय में दापर PIL संख्या 1950/2024 (आनंद कुमार बनाम झारखंड सरकार के आलोक में खनन पट्टों की वन सीमा से दूरी 400 मीटर तथा क्रमतर इकाइयों की दूरी 500 मीटर निर्धारित किए जाने के प्रभाव पर विस्तृत चर्चा की गई। इस निर्णय के परिणामस्वरूप राज्य के अधिकांश क्रशर एवं खनन पट्टों के Consent to Operate (CTO) पर रोक लग गई है. जिससे पूरा उद्योग गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है।
अध्यक्ष श्री चंदेश्वर प्रसाद सिंह ने कहा कि वर्ष 2015 से पूर्व वन सीमा से दूरी 500 मीटर निर्धारित थी, जिसे सरकार के पत्रांक सख्या B-12. दिनांक 07-12-2015 द्वारा घटाकर 250 मीटर कर दिया गया था। वर्तमान में माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के पश्चात पुनः पूर्व की व्यवस्था प्रभावी हो गई है। राज्य के सभी व्यवसायियों ने उस समय प्रचलित नियमों के अनुरूप अपने-अपने लाइसेंस प्राप्त किए थे तथा उसी के आधार पर पर्यावरण स्वीकृति, स्थापना की अनुमति एवं संचालन की स्वीकृति प्राप्त कर खनन एवं क्रशर इकाइयों में निवेश किया। इस हेतु अनेक व्यवसायियों ने बैंक से ऋण भी लिया है।
किंतु वर्तमान न्यायालयीन आदेश के कारण अचानक उत्पन्न स्थिति से झारखंड के पत्थर खनन एवं क्रशर उद्योग से जुड़े सभी व्यवसापियों के समक्ष गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। साथ ही इस उद्योग से जुड़े हजारों मजदूरों के समक्ष आजीविका का संकट भी खड़ा हो गया है। व्यवसाय बंद होने की स्थिति में राज्य सरकार को भी भारी राजस्व हानि उठानी पड़ेगी।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि वर्तमान स्थिति बनी रहती है तो राज्य के लगभग 60% से 80% तक पत्थर खदानें एवं क्रशर इकाइयाँ तत्काल प्रभावित होकर बंद हो सकती हैं. जिससे पत्थर (गिट्टी) की आपूर्ति बाधित होगी तथा राज्य के इंफ्रास्ट्रक्बर विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। परिणामस्वरूप आम जनता को भी बालू की तरह गिट्टी ऊँचे दामों पर उपलब्ध हो सकती है।
उन्होंने यह भी बताया कि अन्य राज्यों जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ एवं ओडिशा में खनन एवं क्रशर इकाइयों के लिए दूरी के मानक अपेक्षाकृत कम (आमतौर पर लगभग 200-300 मीटर, जो क्षेत्र एवं श्रेणी के अनुसार भिन्न हो सकते हैं) रखे गए हैं। साथ ही भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा दिनांक 29 जनवरी 2025 एवं 30-01-2025 को प्रकाशित गजट में भी वन सीमा से दूरी लगभग 250 मीटर निर्धारित की गई है।
इस तुलना से स्पष्ट है कि झारखंड में वर्तमान 400 मीटर एवं 500 मीटर की दूरी अपेक्षाकृत अधिक कठोर है, जिससे उद्योग संचालन में व्यावहारिक कठिनाइयों उत्पन्न हो रही हैं।
संघ के उपाध्यक्ष अनिल सिंह ने सरकार से अविलंब नियमों में आवश्यक संशोधन करने की मांग की, ताकि इस उद्योग को बंद होने से बचाया जा सके। उन्होंने कहा कि झारखंड एक खनिज संपन्न राज्य है, अतः सरकार को उद्योगों के अनुकूल नीतियाँ बनानी चाहिए।
राँची के पत्थर व्यवसायी श्री नितेश सारदा ने कहा कि राज्य में खनन रॉयल्टी दर देश में सर्वाधिक होने के कारण व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, जिससे अन्य राज्यों की तुलना में प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो गया है।
संघ के सचिव पंकज सिंह ने वन सीमा से दूरी, RCD से संबंधित मामलों, राज्य सरकार द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय में SLP दापर करने की आवश्यकता, खनन रॉयल्टी एवं अन्य विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
बैठक में राज्य के विभिन्न जिलों से आए अनेक प्रमुख व्यवसायी उपस्थित रहे, जिनमें प्रमुख रूप से रामाशीष सिंह, नितिन गुप्ता (पलामू), अरुण सिंह, मुकेश सिंह, बिरजू पाठक, जगदीप अग्रवाल (धनबाद), आशित मंडल, मोहन ग्रोवर, शैलेंद्र मेहता (हजारीबाग), राजेश मेहता, रामेश्वर पंडित, मोहनलाल जैन (बोकारो), विक्की जी. रामरतन महर्षि (कोडरमा), गोपी सदवानी, प्रशांत पांडे (साहिबगंज), अशोक धानुका (राँची), प्रेम कुमार, अमित पांडे (जामताड़ा), मोहम्मद साजिद, उज्जवल सिंह (टाटा), चित्तौ दा, विकास सिंह, सम्राट सिंह (कोडरमा) ढीहचंद मेहता (कोडरमा) आदि शामिल थे।
बैठक का संचालन गोपी सादवानी ने किया।
अंत में सभी व्यवसायियों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि वे मुख्यमंत्री से मिलकर उद्योग से संबंधित समस्याओं से अवगत कराएंगे तथा उनके त्वरित समाधान की मांग करेंगे।
धन्यवाद ज्ञापन किशोर खेमानी के द्वारा किया गया।

