
रांची। झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) से मगही, भोजपुरी और अंगिका भाषाओं को हटाने के बाद उत्पन्न विवाद के निपटारे को लेकर बनी मंत्रिमंडलीय समिति के समक्ष अधिकारी कागजात के बगैर पहुंच गए थे। सोमवार को पांच मंत्रियों की समिति की हुई पहली बैठक में स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग की ओर से अधिकृत तौर पर बताया गया कि झारखंड अधिविद्य परिषद से कई जानकारियां मिल नहीं पा रही हैं।
इसके बाद समिति की ओर से अधिकारियों को कुछ और समय देते हुए शुक्रवार को विस्तार से विवरण के साथ आने का निर्देश दिया गया। अब अगली बैठक शुक्रवार को होगी।
किस आधार पर 2025 की नियमावली से हटाया गया?
मंत्रिमंडलीय समिति ने बैठक में अधिकारियों से स्पष्ट तौर पर पूछा कि पूर्व में इन तीन भाषाओं को किस आधार पर वर्ष 2012 की जेटेट नियमावली में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं की सूची में सम्मिलित किया गया था और किस आधार पर 2025 की नियमावली से हटाया गया।
समिति ने रिपोर्ट जल्द तैयार करने में अधिकारियों से सहयोग करने को कहा ताकि परीक्षा में अनावश्यक विलंब न हो और इसी परीक्षा से बदलाव को लागू किया जा सके। समिति ने वर्ष 2012 और 2016 की नियमावली के आधार पर आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा तथा जेएसएसी द्वारा आयोजित नियुक्ति परीक्षा का ब्यौरा भी मांगा। इसमें पूछा गया कि किन-किन भाषाओं को परीक्षा में सम्मिलित किया गया था और कितने अभ्यर्थियों ने उन भाषाओं में परीक्षा दी थी।
भाषाओं को हटाने की आवश्यकता क्यों?
समिति ने यह भी जानना चाहा कि वर्ष 2008 की जेपीएससी परीक्षा में जब भोजपुरी, मगही और अंगिका को स्थान दिया गया था, तो बाद में इन्हें हटाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई।
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2016 में कार्मिक विभाग के निर्देश पर इन भाषाओं को हटाया गया था, जिसपर समिति ने नाराजगी जताई। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देश पर वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की अध्यक्षता में गठित इस कमेटी में मंत्री दीपिका पांडेय सिंह, संजय प्रसाद यादव, सुदिव्य कुमार और योगेंद्र प्रसाद शामिल हैं। बैठक में पांचो मंत्रियों के अलावा कार्मिक सचिव प्रवीण टोप्पो और शिक्षा सचिव उमाशंकर सिंह भी मौजूद रहे।

