: झारखंड हाईकोर्ट के एक फैसले से ईंट भट्ठा संचालकों को बड़ा झटका लगा है. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि ईंट बनाने के लिए मिट्टी निकालने पर अब ईंट भट्ठा संचालकों को पर्यावरण स्वीकृति (Environmental Clearance) और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CTO) की अनुमति लेना अनिवार्य होगा.
: साथ ही उन्हें डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) में भी कमाई का एक हिस्सा जमा करना होगा. झारखंड हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने ईंट भट्ठा मालिकों की याचिका को खारिज कर दिया.



कोर्ट ने कहा कि ईंट भट्ठों में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी ‘लघु खनिज’ (माइनर मिनरल) की श्रेणी में आती है, इसलिए इस पर झारखंड माइनर मिनरल कंसेशन रूल्स, 2004 पूरी तरह लागू होंगे.
: पूर्वी सिंहभूम सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों के ईंट भट्ठा संचालकों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर यह मांग की थी कि मिट्टी निकालने के लिए पर्यावरण स्वीकृति और CTO की जरूरत नहीं है. ईंट भट्ठे खनन की श्रेणी में नहीं आते, इसलिए DMFT का भुगतान नहीं लिया जा सकता है.



ईंट भट्ठा संचालकों की याचिका पर 15 जनवरी को सुनवाई हुई. सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ईंट निर्माण की प्रक्रिया मिट्टी निकालने से शुरू होती है, इसलिए मिट्टी का उत्खनन और ईंट निर्माण को अलग-अलग नहीं किया जा सकता. मिट्टी भी पर्यावरण का हिस्सा है, बड़े पैमाने पर इसका उत्खनन करने से भूमि, जल और वायु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.
: पूर्वी सिंहभूम सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों के ईंट भट्ठा संचालकों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर यह मांग की थी कि मिट्टी निकालने के लिए पर्यावरण स्वीकृति और CTO की जरूरत नहीं है. ईंट भट्ठे खनन की श्रेणी में नहीं आते, इसलिए DMFT का भुगतान नहीं लिया जा सकता है.



ईंट भट्ठा संचालकों की याचिका पर 15 जनवरी को सुनवाई हुई. सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ईंट निर्माण की प्रक्रिया मिट्टी निकालने से शुरू होती है, इसलिए मिट्टी का उत्खनन और ईंट निर्माण को अलग-अलग नहीं किया जा सकता. मिट्टी भी पर्यावरण का हिस्सा है, बड़े पैमाने पर इसका उत्खनन करने से भूमि, जल और वायु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.
खनन पट्टा समय से पहले रद्द करने के निर्णय को हाईकोर्ट ने सही ठहराया, याचिका खारिज
झारखंड हाईकोर्ट ने पत्थर खनन पट्टे से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में याचिकाकर्ता आनंद कुमार सिंह को कोई राहत देने से इनकार कर दिया है. अदालत ने रॉयल्टी की राशि का भुगतान न किए जाने को गंभीर मानते हुए खनन पट्टा समय से पहले रद्द किए जाने के निर्णय को सही ठहराया है.




यह मामला पलामू जिले के चपरवार मौजा में स्थित पत्थर खनन पट्टे से जुड़ा है, जिसे वर्ष 2014 से 10 वर्षों के लिए आवंटित किया गया था. याचिकाकर्ता को पर्यावरण स्वीकृति और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति भी प्राप्त थी. हालांकि, वर्ष 2016 से 2019 के बीच खनन रॉयल्टी का भुगतान नहीं किए जाने का आरोप सामने आया.



जिला खनन पदाधिकारी द्वारा 30 दिन का नोटिस जारी किए जाने का दावा किया गया. लेकिन इसके बावजूद बकाया राशि जमा नहीं की गई. इसके बाद पलामू डीसी ने खनन पट्टा समाप्त करने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी, जिसकी सूचना 8 फरवरी 2020 को दी गई.


याचिकाकर्ता ने इस निर्णय को यह कहते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी कि उपायुक्त द्वारा कोई औपचारिक आदेश पारित नहीं किया गया और बिना विधिवत नोटिस के पट्टा रद्द कर दिया गया. लेकिन राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि रॉयल्टी बकाया एक स्वीकृत तथ्य है और नियमों के तहत उपायुक्त को पट्टा रद्द करने का अधिकार है.



हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि जब रॉयल्टी भुगतान न होने का तथ्य विवादित नहीं है, तब मामले को फिर से उपायुक्त के पास भेजना केवल औपचारिकता होगी.




अदालत ने स्पष्ट किया है कि ऐसी स्थिति में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हवाला देकर राहत नहीं दी जा सकती है. अदालत ने यह भी माना है कि खान आयुक्त द्वारा पुनरीक्षण याचिका खारिज किया जाना विधिसम्मत है. परिणामस्वरूप हाईकोर्ट ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया

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