मॉस्को/कीव। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे महायुद्ध के बीच एक ऐसी कहानी सामने आ रही है जो मानवता को शर्मसार कर देने वाली है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और यूक्रेन ने मॉस्को पर बेहद संगीन आरोप लगाए हैं। दावा किया गया है कि युद्धग्रस्त इलाकों से हजारों यूक्रेनी बच्चों को जबरन रूस ले जाया जा रहा है, जहाँ उनका ‘रूसीकरण’ (Russification) किया जा रहा है। यह मामला इतना तूल पकड़ चुका है कि ‘इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट’ (ICC) ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट तक जारी कर दिया है।
छुट्टियों के बहाने ‘ब्रेनवाश’: पहचान मिटाने की साजिश?
यूक्रेन का दावा है कि अब तक लगभग 19,500 बच्चों को अवैध रूप से सीमा पार ले जाया गया है। रूस इन कैंपों को ‘मानवीय सहायता’ और ‘समर कैंप’ बताता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इन कैंपों में मासूम बच्चों को यह पढ़ाया जा रहा है कि यूक्रेन कभी कोई स्वतंत्र देश था ही नहीं। वहाँ यूक्रेनी भाषा बोलने पर पाबंदी है और छोटे-छोटे हाथों में खिलौनों की जगह हथियार थमाकर उन्हें सैन्य ड्रिल की ट्रेनिंग दी जा रही है। दुनिया इसे ‘सांस्कृतिक नरसंहार’ (Cultural Genocide) के रूप में देख रही है।
रूस का बचाव और मध्यस्थता की धुंधली उम्मीद
दूसरी ओर, मॉस्को इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करता रहा है। क्रेमलिन का तर्क है कि वे बच्चों को अगवा नहीं कर रहे, बल्कि युद्ध की आग से बचाकर उन्हें सुरक्षित आश्रय दे रहे हैं। उनकी नजर में यह पुनर्वास है, न कि जबरन धर्मांतरण या पहचान का संकट। हालांकि, कतर जैसे देशों की मध्यस्थता से अब तक केवल 400-500 बच्चे ही अपने माता-पिता के पास वापस पहुँच पाए हैं। शेष हजारों बच्चे अब भी रूस के उन अनजान कैंपों में कैद हैं, जहाँ वे हर दिन अपनी भाषा और अपनी पहचान भूलने को मजबूर किए जा रहे हैं।


