
रांची, 31 जनवरी 2026।
वाई बी एन विश्वविद्यालय, रांची में भारतीय ज्ञान परंपरा सेल का भव्य उद्घाटन एवं
भारतीय ज्ञान परंपरा और नागरिक चेतना: आधुनिक नागरिकता के लिए प्राचीन मूल्य
विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन वाई बी एन विश्वविद्यालय, रांची एवं वाई बी एन कॉलेज फॉर टीचर्स एजुकेशन के संयुक्त तत्वावधान में हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व क्षेत्रीय संघचालक श्री सिद्धनाथ सिंह, उद्घाटनकर्ता रामकृष्ण मिशन, रांची के सह सचिव स्वामी अंतरानंद महाराज तथा विशिष्ट अतिथि राजकमल सरस्वती विद्यामंदिर, धनबाद के संस्थापक प्राचार्य डॉ. वासुदेव प्रसाद रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं कुलगीत के साथ हुआ तथा समापन वंदे मातरम् एवं राष्ट्रगान से किया गया।
स्वामी अंतरानंद महाराज ने कहा —
भारतीय ज्ञान परंपरा भारत की आत्मा है। यदि शिक्षा में नैतिकता, अध्यात्म और सेवा भाव को जोड़ा जाए तो समाज और राष्ट्र दोनों सशक्त बनते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा सेल विद्यार्थियों को संस्कारवान, आत्मचिंतनशील और उत्तरदायी नागरिक बनाने की दिशा में एक सार्थक पहल है।
मुख्य अतिथि सिद्धनाथ सिंह ने कहा —
भारतीय सभ्यता और संस्कृति विश्व को मानवता, करुणा और सह-अस्तित्व का संदेश देती रही है। वेद, उपनिषद और बुद्ध दर्शन आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। शिक्षा के माध्यम से नागरिक चेतना को जागृत कर ही सशक्त राष्ट्र निर्माण संभव है।
चेयरमैन रामजी यादव ने कहा —
वाई बी एन विश्वविद्यालय मूल्य आधारित शिक्षा के लिए संकल्पित है। भारतीय ज्ञान परंपरा सेल के माध्यम से विद्यार्थियों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते हुए उन्हें आधुनिक, जिम्मेदार और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक के रूप में तैयार किया जाएगा।
डॉ. संजय कुमार मिश्रा ने ‘संकल्प से सिद्धि’ का दर्शन प्रस्तुत किया —
डी.ए.वी. बरियातू, रांची के प्राचार्य डॉ. संजय कुमार मिश्रा ने अपने वक्तव्य में कहा कि जीवन और शिक्षा का लक्ष्य संकल्प से सिद्धि की यात्रा है। उन्होंने इसे चार ‘प’—प्रतिज्ञा, पुरुषार्थ, प्रार्थना और प्रतीक्षा से जोड़ते हुए कहा कि जब व्यक्ति सच्ची प्रतिज्ञा के साथ निरंतर पुरुषार्थ करता है, ईश्वर में आस्था रखते हुए प्रार्थना करता है और धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करता है, तब अंततः प्राप्ति सुनिश्चित होती है। यह दर्शन भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा है, जो आज के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
डॉ. अपराजिता झा ने कहा —
भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा को केवल सूचना अर्जन नहीं, बल्कि जीवन निर्माण का माध्यम माना गया है। आज के समय में प्राचीन मूल्यों के माध्यम से आधुनिक नागरिक चेतना का विकास अत्यंत आवश्यक हो गया है।
तकनीकी सत्रों में हुआ गहन विचार-विमर्श
संगोष्ठी का आयोजन दो तकनीकी सत्रों में किया गया।
प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, रांची की पूर्व प्राचार्य एवं शिक्षा संकायाध्यक्ष डॉ. अपराजिता झा ने की, जबकि द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. वासुदेव प्रसाद ने की।
प्राचीन से आधुनिक काल तक की यात्रा दर्शाता नाटक बना आकर्षण का केंद्र
सत्र 2025–27 के बी.एड. प्रशिक्षु शिक्षकों द्वारा प्राचीन काल, वैदिक काल, बुद्ध काल, मुगल काल एवं आधुनिक काल पर आधारित नाटक का प्रभावशाली मंचन किया गया।
मुगल काल: विशाल, सौरभ कुमार, पल्लवी कुमारी, खुशी कुमारी, नेहा कुमारी, रीता कुमारी
बुद्ध काल: दिव्य पांडेय, सचिन कुमार, रीता कुमारी, विजय कुमार, राजू कुमार
वैदिक काल: गुंजन कुमारी, अंशिका कुमारी, दीपाली, विकास
आधुनिक काल: प्रियांशी उपाध्याय, प्रभात कुमार, प्रकृति कुमारी, विवेक कुमार
नाटक का निर्देशन डॉ. शुभाशीष सिंह एवं डॉ. निकिता ने किया।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बढ़ाया कार्यक्रम का गौरव
सामूहिक स्वागत नृत्य की प्रस्तुति सान्या, सेबीना, सिखा कुमारी, दीपिका, ऋतु लकड़ा, सोनिका, कुसुम, पिंकी कुमारी, निशा लकड़ा, कुसुम रुड, जयंती, ज्ञानी एवं गुरवीणा ने दी।
कुलगीत की प्रस्तुति डॉ. रूपा द्वारा की गई।
122 शिक्षाविदों की गरिमामयी उपस्थिति
कार्यक्रम में विभिन्न संस्थानों से आए कुल 122 शिक्षाविद एवं प्रबुद्धजन सम्मानित अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

