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Home»Uncategorized»अपने ही देश में हक और पहचान के लिए क्यों ठोकरें खा रहे आदिवासी: हेमंत सोरेन
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अपने ही देश में हक और पहचान के लिए क्यों ठोकरें खा रहे आदिवासी: हेमंत सोरेन

जस्ट पोस्टBy जस्ट पोस्टApril 8, 2026No Comments2 Mins Read0 Views
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झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर आदिवासी समाज की पीड़ा को मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया है. मुख्यमंत्री ने अपने पोस्ट में सवाल उठाया है कि अंग्रेजों के सामने कभी न झुकने वाले, जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए सदियों से संघर्ष करने वाले और स्वाभिमान को कभी न बेचने वाले आदिवासियों को आज अपने ही देश में हक और पहचान के लिए दर-दर की ठोकरें क्यों खानी पड़ रही हैं.
मुख्यमंत्री ने लिखा है कि यह केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र के आईने में दिखती सच्चाई है. जिन समुदायों ने औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ सबसे पहले और निर्णायक लड़ाइयां लड़ीं, चाहे वह संथाल हूल हो या भगवान बिरसा मुंडा का उलगुलान, आज वही समुदाय अपने ही संविधान के भीतर मान्यता और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उन्होंने इसे बड़ी विडंबना बताया है.
मुख्यमंत्री ने पोस्ट के साथ तीन पोस्टर भी साझा किए हैं. इन पोस्टरों के माध्यम से असम के चाय बागानों में रह रहे आदिवासी भाई-बहनों से संवाद किया गया है. पोस्टरों में जोहार नमस्कार के साथ हिंदी, असमिया और अंग्रेजी में अपील की गयी है कि असम की धरती पर सदियों से रह रहे आदिवासियों को अब तक अनुसूचित जनजाति (एसटी) का संवैधानिक दर्जा नहीं मिला है, जो राष्ट्रीय स्तर का अन्याय है.
पोस्टर में कहा गया है कि ब्रिटिश काल में घरों से दूर लाए गए और चाय बागानों की अर्थव्यवस्था को अपने खून-पसीने से खड़ा करने वाले इन आदिवासियों को आजादी के बाद भी न पहचान मिली और न सम्मान. मुख्यमंत्री ने लिखा है कि यह मुद्दा किसी पार्टी की राजनीति से ऊपर है, बल्कि न्याय, सम्मान और पहचान का सवाल है. मुख्यमंत्री ने असम के आदिवासी मतदाताओं से एसटी मान्यता, न्यूनतम 500 रुपये दैनिक मजदूरी, बच्चों की बेहतर शिक्षा, आवास और रोजगार जैसे मुद्दों को ध्यान में रखते हुए जेएमएम-जेबीपी उम्मीदवार को समर्थन देने की अपील की है. उन्होंने कहा है कि जब तक न्याय अधूरा है, तब तक लोकतंत्र भी अधूरा रहेगा.

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