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Home»Uncategorized»हर व्यक्ति में राम, उन्हें आचरण में उतारने की जरूरत” मुनि प्रमाण सागर जी
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हर व्यक्ति में राम, उन्हें आचरण में उतारने की जरूरत” मुनि प्रमाण सागर जी

जस्ट पोस्टBy जस्ट पोस्टMarch 27, 2026No Comments3 Mins Read10 Views
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रांची। रामनवमी के पावन अवसर पर गुणायतन प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने कहा कि आज घर-घर में रामायण तो है, लेकिन जीवन में राम के आदर्शों का अभाव दिखाई देता है। वे इटकी रोड स्थित परस मार्बल परिसर में पदयात्रा के दौरान ठहराव पर श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उनका मंगल विहार मध्यप्रदेश से श्री सम्मेद शिखरजी की ओर जारी है।मुनिश्री ने कहा कि राम दो रूपों में हैं—एक व्यक्ति के रूप में और दूसरा वृत्ति (स्वभाव) के रूप में। त्रेता युग के भगवान राम की यात्रा अयोध्या से शुरू होकर सीता स्वयंवर, वनवास और फिर राज्याभिषेक तक जाती है, लेकिन वास्तविक संदेश उनके जीवन के आदर्शों में छिपा है। उन्होंने कहा कि राम केवल इतिहास के महापुरुष नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के भीतर मौजूद एक आदर्श हैं। प्रवचन के दौरान उन्होंने राम और रावण के प्रतीकात्मक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि राम धर्म, प्रेम और मर्यादा के प्रतीक हैं, जबकि रावण अहंकार, छल और कपट की वृत्ति को दर्शाता है। आज समाज में राम की वृत्ति घटती जा रही है और रावण की वृत्ति बढ़ती दिख रही है। उन्होंने कहा कि जीवन का शुक्ल पक्ष राम है और कृष्ण पक्ष रावण की प्रवृत्ति को दर्शाता है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि वह किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। मुनिश्री ने कहा कि रामनवमी केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मसात करने का दिन है। मर्यादा, कर्तव्य और संबंधों की मधुरता को जीवन में उतारना ही सच्ची श्रद्धा है। उन्होंने कहा कि मंदिरों का निर्माण हो चुका है, अब जरूरत है कि राम की मर्यादा को अपने व्यवहार में उतारा जाए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि राम राजपुत्र होते हुए भी पिता के आदेश पर बिना किसी विरोध के वनवास चले गए। यह उनके पुत्र धर्म और वचनबद्धता का सर्वोच्च उदाहरण है। आज के समय में पिता-पुत्र के संबंधों में मर्यादा का अभाव दिखाई देता है, जिसे सुधारने की आवश्यकता है। जैन रामायण का उल्लेख करते हुए मुनिश्री ने बताया कि कैकई ने भरत को राजा बनाने की इच्छा जताई थी, वनवास की मांग नहीं की थी। राम ने स्वयं परिस्थितियों को समझते हुए अपने आचरण की मर्यादा बनाए रखी और वनवास स्वीकार किया, ताकि भाई भरत के प्रति प्रेम और परिवार की गरिमा बनी रहे। उन्होंने कहा कि राम ने भावनाओं की मर्यादा का भी सम्मान किया—केवट की भावना का आदर करते हुए पाद प्रक्षालन स्वीकार किया और शबरी के प्रेम से दिए गए बेर खाए। यही उनके जीवन की महानता है। अंत में मुनिश्री ने आह्वान किया कि महापुरुषों की केवल पूजा ही नहीं, बल्कि उनके आदर्शों का अनुसरण भी जरूरी है। हर व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति संवेदनशील और निष्ठावान बनना चाहिए, तभी समाज में राम के आदर्श स्थापित हो सकेंगे।

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