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Home»Uncategorized»गणगौर मिलान बड़ा तालाब में गणगौर विसर्जन
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गणगौर मिलान बड़ा तालाब में गणगौर विसर्जन

जस्ट पोस्टBy जस्ट पोस्टMarch 21, 2026No Comments6 Mins Read56 Views
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माहेश्वरी समाज द्वारा 1981 से मारवाड़ी समाज के खास पर्व गणगौर की राजस्थानी परंपरा की पुरानी विरासत को संजोए हुए गणगौर पूजा की सार्वजनिक व्यवस्था गणेश नारायण साबू चौक, सेवा सदन पथ,अपर बाजार स्थित श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर में शुरू की।
गणगौर पूजा मारवाड़ी समाज का प्रमुख लोक पर्व है।जो होलिका दहन के दूसरे दिन से 16 दिनों तक चलने वाला यह पर्व मूलतः कुवांरी लड़कियों व सुहागन महिलाओं का त्योहार है।
आज श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर में सुबह 6.00 बजे से शुरू हुई गणगौर पूजा अपराह्न 2.00 बजे तक अनवरत चलती रही।गणगौर मिलान एवं विसर्जन के लिए अपराह्न 2.00 बजे से मारवाड़ी समाज की महिलाओं के आने का सिलसिला जो शुरू हुआ वो संध्या 6.00 बजे तक जारी रहा।मंदिर परिसर में गणगौर मिलान एवं बड़ा तालाब में गणगौर विसर्जन घाट की व्यवस्था माहेश्वरी समाज के तीनों संगठन (श्री माहेश्वरी सभा, माहेश्वरी महिला समिति, माहेश्वरी युवा संगठन) के सहयोग से सुचारू रूप से चला। माहेश्वरी भवन में लगायें गए गणगौर मेला में गणगौर विसर्जन करने आई महिलाओं ने रात्रि 8.00 बजे तक मेला में बने लजीज व्यंजन का आनंद लिया।
इस महोत्सव को सफल बनाने में रांची सभा अध्यक्ष किशन साबू , महिला अध्यक्ष भारती चितलांगिया,रश्मि मालपानी युवा अध्यक्ष विनय मंत्री, सभा सहसचिव वसंत लखोटिया , संयोजक कुमुद लखोटिया, लक्ष्मी चितलांगिया , सुरेश शारदा, अमित मालपानी,नयन बोरा, मोहित लाखोटिया एवं समाज के तीनों संगठन के सदस्यों का सहयोग रहा।

गणगौर व्रत पूजा के दौरान इस कथा का पाठ है जरूरी हर वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को गणगौर का पावन व्रत रखा जाता है, जिसे गौरी तृतीया भी कहा जाता है. इस दिन भगवान शिव (ईसर) और माता पार्वती (गौरी) की पूजा विशेष रूप से की जाती है.
यह पर्व विशेषकर महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए व्रत रखती हैं, वहीं कुंवारी कन्याएं मनचाहा जीवनसाथी पाने की कामना करती हैं.
साल 2026 में गणगौर का पर्व 21 मार्च, शनिवार को मनाया जाएगा. यह दिन शिव-पार्वती के पवित्र मिलन और दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. इस दिन व्रत रखने के साथ गणगौर से जुड़ी पौराणिक कथा का पाठ करना अत्यंत आवश्यक माना गया है, जिससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है.
गणगौर 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, चैत्र शुक्ल तृतीया तिथि की शुरुआत 21 मार्च 2026 को तड़के 02:31 बजे हो चुकी है और इसी दिन रात 11:57 बजे इसका समापन होगा. इसलिए पूरे दिन गणगौर का पर्व मनाया जाएगा. इस दौरान महिलाएं विधि-विधान से पूजा कर शिव और गौरी का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं.
गणगौर का धार्मिक महत्व
गणगौर पर्व का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती के पवित्र दांपत्य जीवन से है. यह त्योहार प्रेम, समर्पण और विश्वास का प्रतीक है. मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं.
इस पर्व में महिलाएं मिट्टी या लकड़ी की गौरी-ईसर की प्रतिमाएं बनाकर उनका श्रृंगार करती हैं. पारंपरिक गीत गाए जाते हैं और पूरे उत्साह के साथ पूजा की जाती है. यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है.
गणगौर व्रत कथा
प्राचीन कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव, माता पार्वती और नारद मुनि पृथ्वी भ्रमण पर निकले. संयोगवश उस दिन चैत्र शुक्ल तृतीया थी. जब वे एक गांव में पहुंचे, तो वहां की निर्धन महिलाएं साधारण जल, फूल और फल लेकर उनकी सेवा में उपस्थित हुईं. उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने अपने हाथों से सुहाग रस छिड़ककर उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया.
कुछ समय बाद गांव की धनी महिलाएं विभिन्न प्रकार के पकवान और आभूषण लेकर पूजा के लिए आईं. तब भगवान शिव ने माता पार्वती से पूछा कि अब आप इन्हें क्या देंगी, क्योंकि आपने तो सारा सुहाग रस पहले ही दे दिया है. इस पर माता पार्वती ने कहा कि निर्धन महिलाओं को उन्होंने बाहरी सुहाग दिया है, लेकिन धनी महिलाओं को वे अपने समान सौभाग्य का आशीर्वाद देंगी. इसके बाद माता पार्वती ने अपनी उंगली से रक्त निकालकर उन महिलाओं पर छिड़क दिया, जिससे उन्हें भी सौभाग्य प्राप्त हुआ. इस प्रकार देवी ने निर्धन और धनी, दोनों को उनके भाव के अनुसार आशीर्वाद प्रदान किया.
शिवलिंग पूजन और वरदान
कथा के अनुसार, इसके बाद माता पार्वती नदी किनारे गईं और वहां बालू से शिवलिंग बनाकर पूजा की. पूजा के पश्चात उन्होंने उसकी परिक्रमा की. उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और वरदान दिया कि जो भी महिला इस दिन शिव और गौरी की पूजा करेगी, उसे अटल सुहाग प्राप्त होगा. यह परंपरा आज भी गणगौर के दिन निभाई जाती है, जहां महिलाएं पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करती हैं.
पार्वती की लीला और शिव की माया
पूजा के बाद जब माता पार्वती लौटने में विलंब हुआ, तो भगवान शिव ने उनसे कारण पूछा. पार्वती जी ने कहा कि उन्हें नदी तट पर अपने भाई-भाभी मिल गए थे, जिन्होंने उन्हें भोजन कराया. शिवजी उनकी बात समझ गए, लेकिन उन्होंने भी उस स्थान पर जाने की इच्छा जताई. जब वे वहां पहुंचे, तो उन्हें एक सुंदर महल दिखाई दिया, जहां पार्वती के कथित भाई-भाभी मौजूद थे. कुछ समय बाद जब वे वापस लौटे, तो शिवजी ने अपनी माला वहीं छूट जाने की बात कही और नारद मुनि को उसे लाने भेजा. नारदजी जब वहां पहुंचे, तो न तो कोई महल था और न ही कोई व्यक्ति. उन्हें केवल एक पेड़ पर शिवजी की माला लटकी हुई मिली. जब उन्होंने यह बात शिव-पार्वती को बताई, तो दोनों मुस्कुराए और कहा कि यह सब एक दिव्य माया थी.
गणगौर कथा का संदेश
गणगौर की यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर के लिए भक्ति और सच्ची भावना ही सबसे महत्वपूर्ण होती है. चाहे व्यक्ति गरीब हो या अमीर, यदि उसकी श्रद्धा सच्ची है, तो उसे ईश्वर का आशीर्वाद अवश्य मिलता है. यह पर्व दांपत्य जीवन में प्रेम, विश्वास और समर्पण को मजबूत करता है. साथ ही यह हमें यह भी सिखाता है कि रिश्तों में मधुरता और समझदारी बनाए रखना कितना आवश्यक है.
गणगौर केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि यह भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह पर्व महिलाओं के जीवन में आशा, विश्वास और प्रेम का संचार करता है. शिव और पार्वती की आराधना के माध्यम से यह त्योहार वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने का संदेश देता है.
इस दिन की गई पूजा और कथा का श्रवण न केवल आध्यात्मिक लाभ देता है, बल्कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भी भरता है. इसलिए गणगौर का पर्व हर वर्ष श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है.

 

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